शुक्रवार, 21 मार्च 2025

फागुन आया गांव में...

 फागुन आया गांव में


दहकी-दहकी दोपहर, बहकी-बहकी रात,
फागुन आया गांव में, लेकर ये सौगात।

प्रकृति में चारों तरफ उत्सव का माहौल है, फागुन आ गया है और अनंग अपने रंग में है। उसके पुष्प-धनुष से शरों का सन्धाान होने लगा है। मन के आकाश में खिलते हुए इन्द्रधनुष और दृष्टि के वातास में बिखरते हुए रंग साहित्य के दर्पण में भी प्रतिच्छवित हो रहे हैं -

खनक उठे हैं लाज के, बागी बाजूबन्द,
संयम के हर छन्द को, होने दो स्वच्छन्द।

आम के बौर को देखकर सहृदय कवि को प्रतीत होता है कि सहकार के ये वृक्ष गुलाबी शंख बजा रहे हैं और उनकी ध्वनि को सुनकर नौजवानों के दिलो की किताबों में सहेजकर रखे गए मोरपंख बाहर आने को अकुला उठे हैं। कभी उसे ऐसा भी लगता है कि फागुन के सैलाब ने समग्र परिवेश को अपने में निमज्जित कर लिया है और रातें रागवती तथा दिवस परागवन्त हो उठे हैं -

चढ़ा गांव दर गांव यूं, ये सैलाबी फाग,
राग-राग है रात हर, प्रात पराग-पराग।

हर कदम पर मोहक बिम्बों की चित्र-वीथी सजी है। चांदनी महुए की गंध की तरह प्राणों में उतरती है तो धूप नवोढ़ा की तरह चेतना में झिलमिलाती है -

मौसम की उच्छ्वास में है महुए की गन्ध,
टूट रहेंगे आज फिर संयम के तटबन्ध।
तथा -

भरे कलश में देह के, क्षीरसिन्धु सा रूप,
बैठी है वट के तले, घूंघट काढ़े धूप।

माथे पर गुलाल का टीका लगाये, आंखों में आत्मीयता भरी दृष्टि का उजास लिये, स्वागत में फैली बांहें और अधरों पर दीप्तिमती मुस्कान लिए उत्सव-पुरुष मुझे होलिकोत्सव के साकार उल्लास की तरह प्रतीत होता है। यश मालवीय याद आते हैं -

उत्सव के दिन आ गए, हंसे खेत-खपरैल,
एक हंसी में धुल गया, मन का सारा मैल।

उत्सव में ‘सव’ शब्द यज्ञ का वाचक है और ‘उत्’ उपसर्ग उध्र्वगमन का प्रतीक होता है। जो हमें ऊंचाई की तरफ न ले जाए, उदात्त न बनाए और यज्ञ अर्थात् समष्टि के हित से न जोड़े वह कैसा उत्सव ? होली अहम् की आहुति देने का, विराट के आलिंगन का और आत्मविसर्जन का महत् पर्व है। रंगों के माध्यम से जब हम स्वर्ग के इन्द्रधनुष को पृथ्वी पर उतार लाते हैं, जलती हुई होली में नवान्न की आहुति देते हुए जब हम व्यष्टि-चेतना को समष्टि चेतना से जोड़ते हैं और एक-दूसरे को बांहों में भरते हुए जब हम ‘एकोऽहम् बहुस्याम’ के लीलाभाव का साक्षात्कार करते हैं, तो हम सच्चे अर्थों में उत्सव की अर्थ-ध्वनियांे को पकड़ पाते हैं अन्यथा हर उत्सव एक औपचारिकता और हर अनुष्ठान एक कर्मकाण्ड बनकर रह जाता है। स्व. नजीर बनारसी कहा करते थे -

पूरा बरस पड़ा है समझ-बूझ के लिए,
इक दिन गुजार लीजिए दीवानेपन के साथ।
जब दिल न मिलने पाये तो मिलने से फायदा,
दिल का मिलन जरूरी है होली-मिलन के साथ।

फागुन की चरमोपलब्धि है होलिकोत्सव और रंग के इस त्योहार की सार्थकता तभी है जब मात्र बाहरी वस्त्र ही रंजित न हों, हमारी व्यक्ति सत्ता की पंचरंग चुनरी भी रंगों से सराबोर हो जाए और ये रंग इतने गाढे चढ़ें कि न ये साल भर छूटंे और न इन्हें छुड़ाने का मन हो।

- डाॅ॰ शिव ओम अम्बर

शनिवार, 17 मार्च 2012

क्या है सार

क्या है सार

मुझे कोई गम नहीं न ही कोई मलाल है 
बस अदना सा सवाल करता बवाल है 
देखो तो सही, ऊपर वाले 
तेरी क्या गजब की चाल है 
खुद हजार वर्ष जी कर भी रहे यौवन की खान 
सुरा और सुंदरी का करते रहे भरपूर पान 
और हम इन्सान चार दशक पार करते ही  दिखते है लाचार 
अभावो के सागर में मुश्किल से लगाते है जीवन की नैया पार 
फिर भी संतोष नहीं दे दी बुढ़ापे की मार 
हाल -बेहाल ऊपर से बीमारियों की  भरमार 
अब तुम्ही बताओ भगवन 
ऐसे जीने का क्या है सार.









बलात्कार


बलात्कार 

बलात्कार की शिकार युवती ने
 न्याय चाहा 
बदले में एक और बलात्कार पाया 
फर्क सिर्फ इतना ही नजर आया 
पहले मजबूर थी आज मज़बूरी है 
न्याय की सीढियाँ बड़ी लम्बी है 
और उनपर चढ़ना जरुरी है.


संजोये हुए सपने को साकार करना है 
जिंदगी को एक नया आकर देना है 
बस उडान भरना है बाकि 
खुला आसमान कब से प्रतीक्षा में है साथी 

शनिवार, 31 दिसंबर 2011

आने वाले नए साल से अपने दिल के   दर्द को बयां करती  हुयी चंद  महीनों में मरने वाली कैंसर पीड़ित महिला की व्यथा  

 तुझे तो आना है बार-बार 

ऐ नए साल तू आयेगा  इठलायेगा इतराएगा 
मदमस्त खुश्बू से जग को नहलाएगा 
और मै
नहीं देख पाऊँगी  तेरी चमक,तेरी  सादगी 
मै ठहरी अभागी 
चंद सांसे है बाकि .


 सुन मुझे देना है तुझे जिम्मेदारियों का भार 
जो अबतक था मेरे जीवन  का आधार 

कल को
 मै तो रहूंगी नहीं किन्तु तुझे तो आना है बार -बार 

देख मेरी बेटी बड़ी भोली है ,
इसकी तो नहीं उठी अभी डोली है 
खुशियों की उम्र , सब से   बेफिक्र 
रखना तू इसका ख्याल , 
जिंदगी   में इसके  रहे न  कोई मलाल .

कल को
 मै तो  रहूंगी नहीं किन्तु तुझे तो आना है बार-बार 

मेरा बेटा बड़ा चंचल है ,हरपल रहती इसके मन में बड़ी हलचल है,
ये ठहरा नादान,भले -बुरे की इसे कहा पहचान  
इसे लेना सम्हाल ,चंद खुशियाँ इसकी झोली में देना तू डाल 
न महसूस हो इसे कभी मेरी कमी ,अभी तो इसकी उम्र बड़ी लम्बी पड़ी .

कल को 
मै तो रहूंगी नहीं किन्तु तुझे तो आना है बार-बार 

मेरे पति हो जायेंगे अनाथ 
सर पर नहीं इनके माँ बाप का भी हाथ 
तब तू देना इनका साथ 
नहीं सह पाएंगे ये जुदाई का आघात 
कल को 
मै तो रहूंगी नहीं किन्तु तुझे तो आना है बार-बार 

सहसा छलछलाई आंखे जिनमे समायी थी आहें 
धीरे से डोली ,मन ही मन बोली 
काश मुझे मिल जाती चन्द सांसे उधार 
   जी भर  करती तेरा सत्कार 
नहीं देती कभी जिम्मेदारी का इतना बड़ा भार
इतना बड़ा भार .

बुधवार, 30 नवंबर 2011

नारी

 नारी 
कैसे -कैसे , कैसी -कैसी
 सहती है नारी हर पीर 
बताता है नैनों से बहता हुआ नीर 
सदियाँ गुजर गयी 
सब कुछ बदल गयी 
न बदली है नारी , न बदलेगी बेचारी 
क्योकिं नारी खुद से ही हारी 

मंगलवार, 30 अगस्त 2011

बांधता है गति को,

  बांधता है गति  को

जब कोई  बांधता है गति  को 
पर करता है अति को
देता हैजन्म हिंसक प्रवति को,
टूटते है बांध ,
घुमड़ते है जोरो से आंधी तूफान 
मच जाता है हाहाकार
लग जाता  है लाशो का अम्बार,
 फिर 
ग्रहण के बंधन होते है असफल 
 सूर्य ,चन्द्र की रौशनी दुगुनी होती है प्रतिपल 
स्वरमयी  नदियाँ बहती है कलकल 
छोडती हुयी पीछे बदबूदार ढेरों  को
बाँधने के लिए बनाये गए घेरो को 
 और 
तब पाती है असीम तृप्ति कों
वेदनाओं की गहनता से मुक्ति कों |





बुधवार, 24 अगस्त 2011

Aajadi ki sakshi .

आजादी की साक्षी 



वो मुझे डराता है ,कंकरीली सड़क दिखाता है,
बताता है कि सत्य का साथ देने वाला गुमनाम कहलाता है
 मे भी  हंसके समझाता हूँ 
पन्नो को  पलटाता  हूँ

अनगिनत क्रांतिवीरो के चित्रों कों शीश नवाता हूँ 
बताता हूँ   की अंधकार के वक्ष स्थल पर  छोटा दीप काफी है 
उसी की रौशनी हमारी आजादी  की  साक्षी है |