रविवार, 24 जुलाई 2011

खामोशियो में चिंगारिया होती है,

खामोशियो में चिंगारिया होती है,
भडके हुए शोलो से बरबादिया होती है ,
गर बदल जाये रुख हवा का 
तो  तबाहियां  ही  तबाहियां  होती है .


मंगलवार, 19 जुलाई 2011

तिल कर आती मौत

तिल तिल कर  आती मौत 
वो लेटा हुआ था ,कभी करवट बदल लेता तो कभी सीधे   
इस्थिर मुद्रा में  छत की ओर टकटकी लगाये देखता रहता ,चाहता था उठना लेकिन नाकाम था .
आँखों की सपाट भाषा बता रही है कि दूर तक अन्धकार विराजमान है ,
चेहरे का दर्द चिल्ला रहा था
की  वो  विवश  है जिंदगी के बचे खुचे दिन बिस्तर पर बिताने को .
सांसो की  प्रत्येक  दस्तक उसके चेहरे को निस्तेज कर देती .
किन्तु 
आज उसका चेहरा दमक रहा है  ,शब्दों से  उत्साह छलक रहा है .
कल उसका आपरेशन है और है  एक उम्मीद 
एक तरोताजा जीवन जीने की
या 
तिल तिल कर  आती मौत से मुक्ती की .

शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

स्वाद के लिए

स्वाद के लिए 
तुम्हारी आँखों से उतर कर दर्द मेरी आँखों में समां जाता है 
असहायता का दंश पीड़ा बन सताता है 
अन्दर का आक्रोश रात - रात जगाता है 
फिर भी नहीं तुमको बचा पता हूँ 
पाता हूँ खुद को असमर्थ 
मूक बनके होने देता हूँ अनर्थ 
बन जाता हूँ बधिर बहने देता हूँ रुधिर 
धिक्कारता हूँ स्वार्थ कों,
समाज कों 
धार्मिक अनुष्ठान कों 
फिर भी नहीं रोक पाता हूँ कत्लेआम कों 
स्वाद के लिए लगाये जाने वाले दाम कों .

इंतजार

इंतजार 
 
मुझे तुम्हारा इंतजार नहीं है ,लेकिन तुम्हे है 
इसलिए नहीं कि तुम्हे मुझसे प्यार है 
इसलिए नहीं  कि तुम्हारे  घर  कों  मेरी जरुरत है 
इसलिए भी नहीं कि तुम्हारा दरबान छुट्टी पर चला गया 
और मुझसे अधिक विश्वासी दरबान नहीं .
वरन इसलिए कि तुम्हारा अहम् आहत है ,
तुम देखना चाहते हो मेरे टूटते अस्तित्व कों 
झांकना चाहते हो मेरी आँखों कि गहराई में 
जंहा भरी हो खारे पानी की झील 
और तुम्हारे पुरुषत्व की जीत .

पहचान

पहचान 
आखिर हमारी पहचान क्या है 
एक सशक्त नारी की 
जो समाज से लड़कर मुकाम पर पहुंची 
 या  प्यार के लिए मां- बाप को ठुकरा कर चली 
अपनों  की जिंदगी बनाने के लिए 
समझौतों की सीढियों 
पर  चढ़ी  
परिवार की भलाई के लिए 
गलाती गई खुद को 
ईश्वर के दरबार में झुकाती गई सर कों 
त्याग कर खुद की पहचान 
चुपचाप पीती गई अपमान 
और लगी  ढूढने  अपनी पहचान दुसरो कें चेहरों में .
 
 
अब और अग्नि परीक्षा नहीं दूंगी राम 

मै और अग्नि परीक्षा नहीं दूंगी राम 
सदियों से जलती आई हूँ ,अब और नहीं जलूँगी 
पराधीनता के लिबास में मायूसी के वास में 
तिल तिल कर नहीं मरूंगी  
मै और अग्नि परीक्षा नहीं दूंगी राम 
शतरंज की बिसात पर झूठी मर्यादा की बात पर 
बार- बार दांव पर नहीं लगुगी  
मै और अग्नि परीक्षा नहीं दूंगी राम 
भरोसा है अपने आप पर 
क़दमों की रफ्तार पर 
नहीं   DUBUNGI    मझदार में 
 और अग्नि परीक्षा नहीं दूंगी राम 
मै जियूंगी इन्द्रधनुषी असमान में 
सपनो की उड़ान में 
नए- नए जहान में 
मै और अग्नि परीक्षा नहीं दूंगी राम 
मै लडूंगी अन्याय से  अत्याचार  से 
व्यभिचार से 
किन्तु अग्नि परीक्षा नहीं दूंगी राम 
मै अब और अग्नि परीक्षा नहीं दूंगी राम 

रविवार, 3 जुलाई 2011

Rain ...

ठहाके 
बरखा तू आना आकर लुभाना
किन्तु   बाढ़ बनकर ठहाके न लगाना
तेरे ठहाके  क्रूरता  के चांटे
करवाते है मानव को न जाने कितने फांके
ऐसे फांके जीवन में न लाना
बरखा तू आना आकर लुभाना .

खुद से  हारी
कैसे-कैसे ,कैसी- कैसी
सहती है नारी हर पीर
बताता है नयनो से बहता हुआ नीर
सदिया गुजर गई
सब कुछ बदल गयी
न बदली है नारी न बदलेगी बेचारी
क्योकि नारी खुद से ही हारी ?