रविवार, 3 जुलाई 2011

Rain ...

ठहाके 
बरखा तू आना आकर लुभाना
किन्तु   बाढ़ बनकर ठहाके न लगाना
तेरे ठहाके  क्रूरता  के चांटे
करवाते है मानव को न जाने कितने फांके
ऐसे फांके जीवन में न लाना
बरखा तू आना आकर लुभाना .

खुद से  हारी
कैसे-कैसे ,कैसी- कैसी
सहती है नारी हर पीर
बताता है नयनो से बहता हुआ नीर
सदिया गुजर गई
सब कुछ बदल गयी
न बदली है नारी न बदलेगी बेचारी
क्योकि नारी खुद से ही हारी ?  


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