स्वाद के लिए
तुम्हारी आँखों से उतर कर दर्द मेरी आँखों में समां जाता है
असहायता का दंश पीड़ा बन सताता है
अन्दर का आक्रोश रात - रात जगाता है
फिर भी नहीं तुमको बचा पता हूँ
पाता हूँ खुद को असमर्थ
मूक बनके होने देता हूँ अनर्थ
बन जाता हूँ बधिर बहने देता हूँ रुधिर
धिक्कारता हूँ स्वार्थ कों,
समाज कों
धार्मिक अनुष्ठान कों
फिर भी नहीं रोक पाता हूँ कत्लेआम कों
स्वाद के लिए लगाये जाने वाले दाम कों .
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