पहचान
आखिर हमारी पहचान क्या है
एक सशक्त नारी की
जो समाज से लड़कर मुकाम पर पहुंची
या प्यार के लिए मां- बाप को ठुकरा कर चली
अपनों की जिंदगी बनाने के लिए
समझौतों की सीढियों
पर चढ़ी
परिवार की भलाई के लिए
गलाती गई खुद को
ईश्वर के दरबार में झुकाती गई सर कों
त्याग कर खुद की पहचान
चुपचाप पीती गई अपमान
और लगी ढूढने अपनी पहचान दुसरो कें चेहरों में .
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