शनिवार, 31 दिसंबर 2011

आने वाले नए साल से अपने दिल के   दर्द को बयां करती  हुयी चंद  महीनों में मरने वाली कैंसर पीड़ित महिला की व्यथा  

 तुझे तो आना है बार-बार 

ऐ नए साल तू आयेगा  इठलायेगा इतराएगा 
मदमस्त खुश्बू से जग को नहलाएगा 
और मै
नहीं देख पाऊँगी  तेरी चमक,तेरी  सादगी 
मै ठहरी अभागी 
चंद सांसे है बाकि .


 सुन मुझे देना है तुझे जिम्मेदारियों का भार 
जो अबतक था मेरे जीवन  का आधार 

कल को
 मै तो रहूंगी नहीं किन्तु तुझे तो आना है बार -बार 

देख मेरी बेटी बड़ी भोली है ,
इसकी तो नहीं उठी अभी डोली है 
खुशियों की उम्र , सब से   बेफिक्र 
रखना तू इसका ख्याल , 
जिंदगी   में इसके  रहे न  कोई मलाल .

कल को
 मै तो  रहूंगी नहीं किन्तु तुझे तो आना है बार-बार 

मेरा बेटा बड़ा चंचल है ,हरपल रहती इसके मन में बड़ी हलचल है,
ये ठहरा नादान,भले -बुरे की इसे कहा पहचान  
इसे लेना सम्हाल ,चंद खुशियाँ इसकी झोली में देना तू डाल 
न महसूस हो इसे कभी मेरी कमी ,अभी तो इसकी उम्र बड़ी लम्बी पड़ी .

कल को 
मै तो रहूंगी नहीं किन्तु तुझे तो आना है बार-बार 

मेरे पति हो जायेंगे अनाथ 
सर पर नहीं इनके माँ बाप का भी हाथ 
तब तू देना इनका साथ 
नहीं सह पाएंगे ये जुदाई का आघात 
कल को 
मै तो रहूंगी नहीं किन्तु तुझे तो आना है बार-बार 

सहसा छलछलाई आंखे जिनमे समायी थी आहें 
धीरे से डोली ,मन ही मन बोली 
काश मुझे मिल जाती चन्द सांसे उधार 
   जी भर  करती तेरा सत्कार 
नहीं देती कभी जिम्मेदारी का इतना बड़ा भार
इतना बड़ा भार .

बुधवार, 30 नवंबर 2011

नारी

 नारी 
कैसे -कैसे , कैसी -कैसी
 सहती है नारी हर पीर 
बताता है नैनों से बहता हुआ नीर 
सदियाँ गुजर गयी 
सब कुछ बदल गयी 
न बदली है नारी , न बदलेगी बेचारी 
क्योकिं नारी खुद से ही हारी 

मंगलवार, 30 अगस्त 2011

बांधता है गति को,

  बांधता है गति  को

जब कोई  बांधता है गति  को 
पर करता है अति को
देता हैजन्म हिंसक प्रवति को,
टूटते है बांध ,
घुमड़ते है जोरो से आंधी तूफान 
मच जाता है हाहाकार
लग जाता  है लाशो का अम्बार,
 फिर 
ग्रहण के बंधन होते है असफल 
 सूर्य ,चन्द्र की रौशनी दुगुनी होती है प्रतिपल 
स्वरमयी  नदियाँ बहती है कलकल 
छोडती हुयी पीछे बदबूदार ढेरों  को
बाँधने के लिए बनाये गए घेरो को 
 और 
तब पाती है असीम तृप्ति कों
वेदनाओं की गहनता से मुक्ति कों |





बुधवार, 24 अगस्त 2011

Aajadi ki sakshi .

आजादी की साक्षी 



वो मुझे डराता है ,कंकरीली सड़क दिखाता है,
बताता है कि सत्य का साथ देने वाला गुमनाम कहलाता है
 मे भी  हंसके समझाता हूँ 
पन्नो को  पलटाता  हूँ

अनगिनत क्रांतिवीरो के चित्रों कों शीश नवाता हूँ 
बताता हूँ   की अंधकार के वक्ष स्थल पर  छोटा दीप काफी है 
उसी की रौशनी हमारी आजादी  की  साक्षी है |

Mother Teresa

      नहीं तेरा कोई सानी ..........

तपते   रेगिस्तान में एक बूंद पानी की 
सूखे खलिहान में छाँव हरियाली की 
मुरझाते जीवन में सांसे खुशिहाली की

बरसाती थी नेह , ब नके मेह
भर्ती थी उर्जा का वेग 
ऐसा था त्याग और तपस्या का
अद्भुत समावेश 

क्या  कहूँ  उनके बारे कुछ 
सारी  उपमाएं  जि नके सामने है तुच्छ 


सच तो ये है 
तू आज भी  जीवित है बन अद्भुत कहानी 
मदर टेरेसा नहीं तेरा कोई सानी
नहीं तेरा कोई सानी |

रविवार, 24 जुलाई 2011

खामोशियो में चिंगारिया होती है,

खामोशियो में चिंगारिया होती है,
भडके हुए शोलो से बरबादिया होती है ,
गर बदल जाये रुख हवा का 
तो  तबाहियां  ही  तबाहियां  होती है .


मंगलवार, 19 जुलाई 2011

तिल कर आती मौत

तिल तिल कर  आती मौत 
वो लेटा हुआ था ,कभी करवट बदल लेता तो कभी सीधे   
इस्थिर मुद्रा में  छत की ओर टकटकी लगाये देखता रहता ,चाहता था उठना लेकिन नाकाम था .
आँखों की सपाट भाषा बता रही है कि दूर तक अन्धकार विराजमान है ,
चेहरे का दर्द चिल्ला रहा था
की  वो  विवश  है जिंदगी के बचे खुचे दिन बिस्तर पर बिताने को .
सांसो की  प्रत्येक  दस्तक उसके चेहरे को निस्तेज कर देती .
किन्तु 
आज उसका चेहरा दमक रहा है  ,शब्दों से  उत्साह छलक रहा है .
कल उसका आपरेशन है और है  एक उम्मीद 
एक तरोताजा जीवन जीने की
या 
तिल तिल कर  आती मौत से मुक्ती की .

शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

स्वाद के लिए

स्वाद के लिए 
तुम्हारी आँखों से उतर कर दर्द मेरी आँखों में समां जाता है 
असहायता का दंश पीड़ा बन सताता है 
अन्दर का आक्रोश रात - रात जगाता है 
फिर भी नहीं तुमको बचा पता हूँ 
पाता हूँ खुद को असमर्थ 
मूक बनके होने देता हूँ अनर्थ 
बन जाता हूँ बधिर बहने देता हूँ रुधिर 
धिक्कारता हूँ स्वार्थ कों,
समाज कों 
धार्मिक अनुष्ठान कों 
फिर भी नहीं रोक पाता हूँ कत्लेआम कों 
स्वाद के लिए लगाये जाने वाले दाम कों .

इंतजार

इंतजार 
 
मुझे तुम्हारा इंतजार नहीं है ,लेकिन तुम्हे है 
इसलिए नहीं कि तुम्हे मुझसे प्यार है 
इसलिए नहीं  कि तुम्हारे  घर  कों  मेरी जरुरत है 
इसलिए भी नहीं कि तुम्हारा दरबान छुट्टी पर चला गया 
और मुझसे अधिक विश्वासी दरबान नहीं .
वरन इसलिए कि तुम्हारा अहम् आहत है ,
तुम देखना चाहते हो मेरे टूटते अस्तित्व कों 
झांकना चाहते हो मेरी आँखों कि गहराई में 
जंहा भरी हो खारे पानी की झील 
और तुम्हारे पुरुषत्व की जीत .

पहचान

पहचान 
आखिर हमारी पहचान क्या है 
एक सशक्त नारी की 
जो समाज से लड़कर मुकाम पर पहुंची 
 या  प्यार के लिए मां- बाप को ठुकरा कर चली 
अपनों  की जिंदगी बनाने के लिए 
समझौतों की सीढियों 
पर  चढ़ी  
परिवार की भलाई के लिए 
गलाती गई खुद को 
ईश्वर के दरबार में झुकाती गई सर कों 
त्याग कर खुद की पहचान 
चुपचाप पीती गई अपमान 
और लगी  ढूढने  अपनी पहचान दुसरो कें चेहरों में .
 
 
अब और अग्नि परीक्षा नहीं दूंगी राम 

मै और अग्नि परीक्षा नहीं दूंगी राम 
सदियों से जलती आई हूँ ,अब और नहीं जलूँगी 
पराधीनता के लिबास में मायूसी के वास में 
तिल तिल कर नहीं मरूंगी  
मै और अग्नि परीक्षा नहीं दूंगी राम 
शतरंज की बिसात पर झूठी मर्यादा की बात पर 
बार- बार दांव पर नहीं लगुगी  
मै और अग्नि परीक्षा नहीं दूंगी राम 
भरोसा है अपने आप पर 
क़दमों की रफ्तार पर 
नहीं   DUBUNGI    मझदार में 
 और अग्नि परीक्षा नहीं दूंगी राम 
मै जियूंगी इन्द्रधनुषी असमान में 
सपनो की उड़ान में 
नए- नए जहान में 
मै और अग्नि परीक्षा नहीं दूंगी राम 
मै लडूंगी अन्याय से  अत्याचार  से 
व्यभिचार से 
किन्तु अग्नि परीक्षा नहीं दूंगी राम 
मै अब और अग्नि परीक्षा नहीं दूंगी राम 

रविवार, 3 जुलाई 2011

Rain ...

ठहाके 
बरखा तू आना आकर लुभाना
किन्तु   बाढ़ बनकर ठहाके न लगाना
तेरे ठहाके  क्रूरता  के चांटे
करवाते है मानव को न जाने कितने फांके
ऐसे फांके जीवन में न लाना
बरखा तू आना आकर लुभाना .

खुद से  हारी
कैसे-कैसे ,कैसी- कैसी
सहती है नारी हर पीर
बताता है नयनो से बहता हुआ नीर
सदिया गुजर गई
सब कुछ बदल गयी
न बदली है नारी न बदलेगी बेचारी
क्योकि नारी खुद से ही हारी ?  


शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

COUPLET

क्षणिकाए,

१. संजोये हुए सपने बिखरते है तो बिखरने दो 
बिखरते हुए सपनो को चुभने दो ,
इनकी चुभन जब सताएगी 
तभी मंजिल करीब और करीब नजर आयेंगी . 

२.हताशाओ को मत बनाओ पथ अपना
सपनो को दो स्वतः ही जन्मना
ये सपने ही तो तेरे है बचपन से घेरे है
ऐसी क्या कमी है जो आज मुंह फेरे है .

३. पहले बेंचते थे बच्चे अब बेंचते है कोख
उदरपूर्ति के लिए ग्राहक लेते है खोज
कुछ तो मिलेगा कम तो चलेंगा ये लेते है सोच
और पलने देते है एक शारीर के अन्दर दुसरे शरीर का बोझ .

HEY PARAM SHAKTI

हे परम शक्ति
हम तुम्हे खुश नहीं कर सकते
क्योकि तुम्हारी जीभ पर खून लगा है
निर्दोशो का खून .
क्या माँ की कोख से पैदा होने वाला मेमना
इतना बड़ा हो गया की वह गुनाह कर सके .
मौत के भय से अपनी जगह पर  स्थिर  
मेमने को  घसीट  कर ले जाना क्या उचित है .
टोकनी में बंद रिहाई के लिए  CHHATPATATI   मुर्गिया
उनकी आवाज  तुम्हे सुनाई ही नहीं देती .
 क्योकि  तुम्हे कुछ दिखाई ही कहा देता है .
तुम आज भी रौद्र रूप धारण किये हुए हो .
हाथो में मुंडमाल लिए हुए उन राक्षसों के जिन्हें तुमने वध कर दिया
नहीं देखती हो उनके वंशजो द्वारा पृथ्वी पर फैलते हुए आतंक को
नहीं देखती हो हिंसा, बलात्कार ,मारामारी को.
कब तक यूही झूठे क्रोध की अग्नि में तपती रहोगी  
जागो और करो संघार छल, कपट,दुराचार का,
अन्याय और अत्याचार का .
सिखाओ सबक, निरीह जानवरों का खून बहाने वालो को 
बताओ उन्हें नहीं चाहिए तुम्हे खून 
तुम ऐसे ही खुश हो सकती हो 
सिर्फ और सिर्फ भक्ति से 
हे परम शक्ति . 

शनिवार, 15 जनवरी 2011

A World of dusk & dawn

Hard times are like a WASHING MACHINE ,they twist ,turn & knock us ,but at the end we come out Cleaner ,Brighter & better than before .